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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 119
इह स्थाने मनो यस्य दैवात् बाति लयं यदा । तदा बाह्य परित्यज्य स्वान्तरे रमते ध्रुवम् ।।
संयोगवश जब साधक का चित्त इस कमल में विलीन हो जाता है तब वह समस्त बाह्य विषयों को छोड़कर शरीर के अन्दर ही प्राणवायु के साथ रमणशील रहा करता है।
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