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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 128
सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्र यतोऽस्ति वै । ततश्चैषा परावृत्त्या तदाज्ञापद्मदक्षिणे । वामनासापुटं याति गङ्गेति परिगीयते ।।
मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) के द्वारा सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मरन्ध्र तक चली गयी है तथा इड़ा नाड़ी सुषुम्ना को आवृत करती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिणी ओर से चलकर बाम नासारन्ध्र में जा पहुँचती है। इसी को 'गंगा' की संज्ञा दी गयी है।
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