योग के चार भेद कहे गये हैं, जैसे - (१) मंत्रयोग, (२) हठयोग, (३) लययोग और (४) राजयोग। इन चारों में चौथा राजयोग द्वैधीभाव से रहित होता है। आशय यह है कि राजयोग के साधक में द्वैतभाव नहीं रह जाता जिसके परिणामस्वरूप वह ईश्वर के साथ एकीकृत हो जाता है।
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