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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 199
क्षणाई निश्चलं तत्र मनो यस्य भवेद् ध्रुवम् । स एव योगी सद्धक्तः सर्वलोकेषु पूजितः । तस्य कल्मषसङ्घातस्तत्क्षणादेव नश्यति ।।
जो साधक इस शून्य में आधे क्षण भी अपने चित्त को निश्चल बना लेता है, वह निश्चय ही समस्त भुवनों में भक्त और पूजनीय माना जताा है।
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