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शिव संहिता • अध्याय 5 • श्लोक 83
आधारपद्यमेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः । परिस्फुरत् वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ।।
उक्त कथित प्रकार आधार पदासंज्ञक कहा जाता है। पद्म के मूलभाग में योनि की अवस्थिति होती है। यह परम दीप्तिमान पद्म अपने चार दलों (पंखुड़ियों) से विभूषित रहता है। उन पंखुडियों पर क्रमशः 'व' से 'स' तक अर्थात् व श ष स - वे चार वर्ण होते हैं। इस पद्मा को मूलाधार चक्र के नाम से जाना जाता है। वह पद्म कुलाभिध अर्थात् कुलसंज्ञक होता है। 'कुल' शब्द का एक अर्थ स्थान भी होता है। अतः इसका अर्थ कुंडलिनी के स्थान से भी लिया जाता है।
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