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अध्याय 1 — जानकी मंगल

जानकी मंगल
238 श्लोक • केवल अनुवाद
गुरु, गणपति (गणेशजी), शिवजी, पार्वतीजी, वाणी के स्वामी बृहस्पति अथवा विष्णुभगवान्, शारदा, शेष, सुकवि, वेद और सरलमति संत
सब को हाथ जोड़कर विनयपूर्वक सिर नवाता हूँ और अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी के विवाहोत्सव का गान करता हूँ।
जहां एक अच्छे दिन श्रीजानकी का मंगलप्रद स्वयंवर रचा गया, जिसका श्रवण करने से श्रीराम और सीताजी हृदय में बसते हैं
वह पृथ्वी का तिलकस्वरूप और तीनों लोकों में विख्यात जो परम पवित्र शोभाशाली और वेदविदित तिरहुत देश है।
वहाँ (तिरहुत देश में) जनकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर बसा हुआ था, जिसमें सुखों की समुद्र लक्ष्मीस्वरूपा श्रीजानकीजी प्रकट हुई थीं।
उस नगर में जनक नाम के एक राजा निवास करते थे, जो सारे गुणों की सीमा थे और जिनके समान कोई दूसरा नहीं था।
जनक के समान नरपति न हुआ, न होगा, न है; जिनकी पुत्री सर्वमंगलमयी जानकीजी हुईं।
राजा ने राजकुमारी को वयस्क होते देख अपने गुरु और परिवार के लोगों को बुलाकर सलाह की और शिव-धनुष को शर्त के रूप में रखकर स्वयंवर रचा। (अर्थात् यह शर्त रखकर स्वयंवर रचा कि जो शिवजी का धनुष चढ़ा देगा, वही कन्या से विवाह करेगा)
राजा ने शिव-धनुष चढ़ाने की शर्त रखकर स्वयंवर रचा, जिसकी सजावट अत्यन्त सुन्दर थी, मानो ब्रह्मा ने अपना सम्पूर्ण कौशल प्रत्यक्ष करके दिखा दिया।
फिर देश-देश में समाचार भेजा गया, जिसे सुनकर राजा लोग प्रसन्न हुए और वे सब-के-सब अपना साज सजा-सजाकर जनकपुर में आये।
वे सुन्दरता, शील, आयु, कुल की बड़ाई, बल और सेना से सुसज्जित होकर चले, मानो इन्द्रों का यूथ ही पृथ्वी पर उतरकर जा रहा हो।
दैत्य, देवता, राक्षस, किन्नर और नागगण भी स्वयंवर का समाचार सुन, राजवेष धारण कर-कर के प्रसन्नचित्त से चले।
कोई चल रहे हैं, कोई मार्ग के बीच में हैं, कोई नगर में घुस रहे हैं और कोई दौड़कर धनुष को पकड़ते हैं और फिर सिर नीचा करके लज्जित हो बैठ जाते हैं (क्योंकि उनसे धनुष टस-से-मस नहीं होता)।
कोई रंगभूमि और नगर की सजावट बड़े चाव से देखते हैं और बड़े भले जान पड़ते हैं, वे अपने मन और नयनों को वहाँ से फेर नहीं पाते।
कोई राजा जनक को अतिथियों का सम्मान करते देखकर उनसे ईर्ष्या करते हैं। इस समय बाहर-भीतर सर्वत्र इतनी भीड़ हो रही है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता।
जहाँ-तहाँ गान और नगारों का कोलाहल एवं चहल-पहल हो रही है। भला जानकीजी के विवाह का आनन्द किससे कहा जा सकता है।
उसी समय विश्वामित्रजी अयोध्यापुरी गये। महाराज ने उनका बड़ा आदर किया और उन्हें घर ले आये।
अपने प्रिय पाहुने को पाकर राजा दशरथ ने उनकी पूजा करके खूब पहुनाई की और कहा कि 'हमारे समान किसी ने पुण्य नहीं किया’ (जिसके प्रभाव से हमें आपका दर्शन हुआ)।
महाराज ने कहा कि ‘हमारे समान किसी ने पुण्य नहीं किया।’ यह बात सुनकर मुनि ने प्रसन्न हो महाराज की बड़ाई की। उस समय महाराज और मुनि के मिलन-सुखको महाराज और मुनि का मन ही जानता था।
प्रेम, भाग्य, सौभाग्य, शील, सुन्दरता और बहुत-से आभूषणों से भरी हुई रानियाँ हृदय से आनन्दित हो अपने पुत्रों सहित ऋषि के पैरों पर पड़ीं।
विश्वामित्रजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इससे वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुईं, मानो उन्होंने नवीन कल्प-लताओं को अमृतरस से सींच दिया हो।
जिस समय मुनि ने भाइयों के सहित श्रीरामचन्द्रजी को देखा, तब उनके नेत्रों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो गया और मन मोहित हो गया।
वे अपने करकमल से श्रीरामचन्द्रजी के मस्तक का स्पर्श करते हैं और हर्षित होकर उन्हें हृदय से लगाते हैं। इस समय मुनिवर प्रेम-सागरमें डूब जाते हैं। उसकी थाह नहीं पाते।
वे आदरपूर्वक उनकी मधुर-मनोहर मूर्ति को देख रहे हैं और बार-बार महाराज दशरथ के पुण्य की सराहना करते हैं।
तब महाराज ने हाथ जोड़कर सुन्दर सुहावने शब्दों में कहा—’आज आपके पवित्र चरणों को देखकर मैं कृतार्थ हो गया'।
हे प्रभु! आप पूर्णकाम हैं और चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष)-के देने वाले हैं, इसी से हे मुनिनायक! मैं आपसे कोई सेवा पूछते हुए डरता हूँ।
कौशिकमुनि ने राजा का वचन सुन उनकी प्रशंसा की और धर्म-कथा कहकर जिस काम के लिये गये थे, वह कहा।
जब मुनीश्वर ने महाराज को अपना कार्य सुनाया, तब महाराज स्नेह और सत्य के बन्धन से जडीभूत हो गये, उनसे कुछ भी उत्तर देते न बना।
महाराज से उत्तर देते नहीं बनता—यह देखकर वसिष्ठजी ने अनेक प्रकार से राजा को समझाया। उन्होंने इधर तो विश्वामित्रजी के तप और तेज का वर्णन किया और उधर कुछ श्रीरामचन्द्रजी का प्रभाव समझाया।
गुरुजी के वचन सुनकर महाराज ने धैर्य धारण किया और फिर कोसलेश्वर महाराज दशरथ ने हाथ जोड़कर कहा—’प्रभो! आप दयासागर और सारी परिस्थिति से अभिज्ञ हैं; अतः आपके सामने बहुत विनय करना उचित नहीं है।'
हे नाथ! घर और वन में नगर और नगरवासियों के सहित मेरी और इन बालकों की रक्षा करने वाली तो आपकी कृपा ही है।
इस प्रकार महाराज ने मुनि से अनेक प्रकार के दीन वचन कहे और श्रीरामचन्द्र एवं लक्ष्मणजी को उन्हें सौंपकर उनके चरण-कमल पकड़ लिये।
माता-पिता की आज्ञा पाकर श्रीराम और लक्ष्मणजी कमर में तरकस और पीताम्बर तथा हाथों में धनुष और बाण लिये गुरु के चरणों पर गिरे।
पुरवासी, राजा और रानियों ने अपने मन को श्रीरामचन्द्रजी के साथ कर दिया और कहने लगे—’हे रघुनन्दन! मुनिवर का कार्य करके कुशलपूर्वक शीघ्र ही लौट आना’।
वे सब शिवजी को मनाकर राम-लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हैं कि ‘तुम विजय और यश प्राप्त करो, नहाने में भी तुम्हारा केश न गिरे (अर्थात् तुम्हें किसी भी अवस्था में किसी प्रकार का कष्ट न हो) और देखो, आने में देरी न करना)।'
उनके चलते समय सकल पुरवासी वियोग से विह्वल हो गये और छोटे भाई शत्रुघ्न के सहित भरतजी ने श्रीरामचन्द्र के चरणों में प्रणाम किया।
तरह-तरह के शुभ शकुन होने लगे, मानो उन्होंने भावी मंगल की सूचना दे दी। तब श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी ने विश्वामित्र मुनि के साथ प्रस्थान किया।
वे क्रमशः श्याम और गौर तथा किशोर अवस्था वाले हैं और दोनों ही मानो मनोहरता के भंडार हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी ने सारी शोभा को बटोरकर ही इन्हें रचा है।
ब्रह्माजी ने इन्हें ऐसा सँवारकर रचा है कि मानो इन्हें छोड़कर अब थोड़ी-सी भी सुन्दरता शेष नहीं रही। चौदहों भुवन में बहुत विचारपूर्वक देखा, परंतु कहीं भी इनकी उपमा नहीं है।
वे ऋषि के साथ मार्ग पर चलते हुए अत्यन्त शोभायमान हो रहे हैं, उनकी वह छबि तुलसीदास के हृदय में बस गयी है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो मधु (चैत्र) और माधव (वैशाख)-के साथ सूर्यदेव उत्तर दिशा को जा रहे हैं।
मार्ग में अनेकों पर्वत, वृक्ष, लता, नदी और तालाब देखते हैं। बालक-स्वभाव से दौड़ते हैं तथा पक्षी और मृगों को रोकते हैं।
और फिर मुनि से डरकर संकुचित हो लौट जाते हैं तथा फल-फूल और नये पत्तों को तोड़कर माला बनाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी के आमोद-प्रमोद को देखकर कौशिकमुनि के हृदय में प्रेम उमड़ आता है। मार्ग में मेघ छाँह किये जाते हैं और देवता लोग फूल बरसाते जाते हैं।
(इसी समय) श्रीरामचन्द्रजी ने ताड़का का वध किया। तब मुनिराज ने उन्हें सब प्रकार योग्य जानकर मन्त्र और रहस्यसहित शस्त्र-विद्या दी।
इस प्रकार विप्र-भय-मोचन श्रीरामचन्द्रजी मार्ग के लोगों के मन और नेत्रों को सफल करते कौशिकमुनि के आश्रम में गये।
वहाँ राक्षसों के समूह का नाश करके विश्वामित्रजी का यज्ञ पूर्ण करवाया और मुनि-समूहको निर्भय किया। भगवान् के इस सुयश को सारे संसार ने गाया।
फिर ब्राह्मण, साधुओं और देवताओं का कार्य मन में रख महामुनि विश्वामित्रजी धनुष-यज्ञ के बहाने श्रीरामचन्द्रजी को लेकर चले।
(मार्ग में श्रीरामचन्द्रजी के चरण-स्पर्श से) गौतम की पत्नी अहल्या का उद्धार करा उसे पतिलोक को भेज दिया और तत्पश्चात् वे महामुनि श्रीरामचन्द्रजी को जनकपुर ले गये।
गाधिसुत श्रीविश्वामित्रजी रामचन्द्रजी को लेकर गये। वे (जनक) पुर को देखकर हृदय में अत्यन्त प्रसन्न हुए। विश्वामित्रजी का आगमन सुन महाराज जनक मन्त्री, गुरु और ब्राह्मणों को लेकर आगे लेने आये।
महाराज ने मुनिवर के चरण पकड़े और उनसे आशीर्वाद पाया, फिर उनका अत्यन्त आदर-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर तो वे अपने मन में मानो सौगुना ब्रह्मसुख अनुभव कर रहे थे।
उस मनोहर मूर्ति को देखकर महाराज जनक के मन में प्रेम उत्पन्न हो गया। वे प्रेम में बँध गये और उनका सारा वैराग्य विरक्त हो गया (अर्थात् जाता रहा)।
वे सानन्द हृदय से सराहना करने लगे कि ‘यह भवसागर बड़ा अच्छा है, जिसमें ऐसे उत्तम माणिक्य पैदा होते हैं। वास्तव में ब्रह्मा बड़े ही चतुर हैं।’
इनके माता-पिता पुण्य के समुद्र हैं, जिनके नेत्ररूप देवताओं को ये बालकरूप कल्पवृक्ष अपने सौन्दर्य-सुधाका सुख प्रदान करते हैं।
हे मुनिनायक! कहिये, ये धनुर्बाणधारी गौर-श्याम शोभामय बालक किस पुण्यात्मा के पुत्र हैं?
(निरन्तर) परमार्थ-चिन्तन करने से मेरा मन विषयों से विमुख हो गया है, किंतु इन्हें देखकर वह अपना बड़ा भारी स्वार्थ जान आनन्द में मग्न हो गया है।
तब मुनीश्वर ने पुलकित होकर प्रेमपूर्वक कहा–’हे पृथ्वीपते! ये बालक ब्रह्ममय, अतएव परमार्थस्वरूप ही हैं।'
ये सूर्यकुल के भूषण (महाराज) दशरथ के पुत्र हैं, इनका नाम राम और लक्ष्मण है और ये दैत्यों का नाश करने वाले हैं।
श्रीरामचन्द्रजी सुन्दरता, शील, आयु और वंश में परिपूर्ण हैं (अर्थात् इन दृष्टियों से इनमें कोई कमी नहीं है)। किंतु अपनी कठिन शर्त जानकर राजा जनक सोच में पड़ गये।
अपनी शर्त का विचार करके महाराज जनक सोच में पड़ गये। फिर मन में धैर्य धारण कर वे अनेक प्रकार से सम्मान करके उन्हें रंगभूमि दिखलाने को ले चले।
विश्वामित्र ने उसकी सुन्दर रचना की बड़ाई की, उसे सुनकर राजा जनक बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी के सहित उन्होंने मुनिवर को सुन्दर सिंहासन दिये।
उस राजाओं की सभा में वे दोनों रघुकुलमणि इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो शरत्काल के दो चन्द्रमा नक्षत्ररूपी राजाओं के मध्य शोभायमान हों।
उनके मस्तक पर सुन्दर काकपक्ष (जुल्फें) हैं और नेत्र कमल के समान हैं तथा उनकी श्याम-गौर मूर्ति सैकड़ों, करोड़ों कामदेवों के मद का नाश करने वाली है।
उनकी भ्रुकुटिरूप कामदेव की कमान पर सुन्दर तिलक बाण के समान सुशोभित है। उनके सुन्दर कर्णभूषण देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।
उनकी नाक, ठोड़ी, कपोल, होठ और दाँत सुन्दर हैं तथा शरत्-काल के चन्द्रमा की निन्दा करने वाला उनका मुख स्वभाव से ही मन को हरने वाला है।
उनका वक्षःस्थल विशाल है, कंधे वृषभ के टिले के समान सुन्दर हैं और भुजाएँ अति बलवान् हैं। वे पीताम्बर और जनेऊ धारण किये हुए हैं तथा उनके गले में मोतियों का हार सुशोभित है।
वे कमर में तरकस और करकमलों में धनुषबाण धारण किये हैं। इस प्रकार उनके सभी अंग मन को मोहने वाले और दर्शनीय हैं।
श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी की शोभा को देख पुरजन आनन्दित हो गये। उनके हृदय में आनन्द, नेत्रों में जल और शरीर में प्रेमजनित रोमांच हो आया।
दोनों भाइयों को देखकर स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि ‘हम जो जगत् में जन्म लेकर आयी थीं सो आज हमें जन्म का फल प्राप्त हुआ।'
'हमने जगत् में जन्म लेकर नेत्रों का लाभ पाया।’ यों कहकर सब शिवजी से मनाती हैं कि सीता को साँवला वर मिले और हम लोग हर्षित होकर मंगल गावें।
कोई कहती हैं कि ‘कुँवर बालक हैं और शिवजी का धनुष वज्र के समान अत्यन्त कठोर है। राजा से यह बात किसी ने नहीं कही कि हंस के बच्चे पर्वत किस प्रकार उठायेंगे।'
श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सब राजा निराश हो गये कि अब तो राजा जनक शर्त त्यागकर जानकी को साँवले वर के साथ ही ब्याह देंगे।
कोई कहते हैं—’अच्छी बात है, विवाह अच्छा होगा, यदि वर और दुलहिन के लिये जनक अपनी शर्त छोड़ देंगे।'
शुद्ध हृदय के ज्ञानवान् राजा लोग कहने लगे 'हमको तो ऐसा जान पड़ता है कि जहाँ तेज, प्रताप और सुन्दरता होती है, वहीं बल भी जान पड़ता है।'
देखो, तुम श्रीरामचन्द्रजी की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते, बेमतलब गाल बजाते हो। प्रारब्धवश तुम लोगों का बल तो लजा ही गया, अब व्यर्थ अपनी सुबुद्धि को मत लजाओ।
श्रीरामचन्द्रजी के उठते ही धनुष अवश्य टूट जायगा और नाक फूटने पर जैसे समाज से उठ जाना पड़ता है, वैसे ही सारे राजसमाज को चला जाना पड़ेगा।
तुम लोग श्रीरामचन्द्रजी के अमृतमय रूपरस को नेत्र भरकर क्यों नहीं पीते? अपने जन्म को कृतार्थ कर लो। नर-पशु क्यों बनते हो?
मुनिवर विश्वामित्र के दोनों ओर दोनों राजकुमार वैसे ही सुशोभित हो रहे हैं जैसे नीले और पीले कमल के बीच में सूर्य हों।
मुनिवर अपने करकमलों से उनकी अलकों का स्पर्श करते हैं, जिससे ऐसा जान पड़ता है, मानो अरुण कमल बालक कामदेवों का लालन करते हों।
अरे, कामदेव के भी मन को चुराने वाली इन मधुर मूर्तियों को तुम सादर क्यों नहीं निहारते? तुम बिना ही प्रयोजन इस राज-समाज में लज्जा त्यागकर अपने को नष्ट करते हो।
राजाओं को ऐसी शिक्षा देकर वे साधुस्वभाव नृपतिगण उनकी अनुपम छबि निरखने लगे। उस समय रघुकुलकुमुदचन्द्र श्रीरामजी को देखकर चकोर के समान उनके नेत्र चन्द्रमा को देखने वाले चकोर पक्षी के समान ठग गये अर्थात् उन्हीं की ओर लगे रह गये।
नगर के स्त्री-पुरुष रघुकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी को देखते हैं और प्रेमवश महाराज जनक को दोष देते हैं।
कोई कहते हैं —’महाराज तो बड़े अच्छे हैं, उन्हें दोष मत दो, देखो, वचन के बिना राजा और भूषण के बिना नाक भले नहीं होते।'
हमारी समझ में तो राजा ने बहुत अच्छा किया जो अपनी शर्त के बहाने हम सबको नेत्रों का फल दिया।
ऐसे पुण्यात्मा राजा मन में जो अभिलाषा करेंगे, उसी को जगदीश्वर पूरा कर देंगे और उनकी प्रतिज्ञा एवं शर्त की रक्षा करेंगे।
यदि महाराज (शर्त करने से) पहले श्रीरामचन्द्रजी का रूप और गुण सुन लेते तो इन्हें बुलाकर जानकीजी को ब्याह देते। उस समय ऐसा करने में महाराज को कोई दोष स्पर्श नहीं करता।
किंतु अब प्रण करके यदि वे पंचों में (जनसमुदाय में) अपना प्रण त्यागते हैं तो विधाता की गति तो जानी नहीं जाती, किंतु संसार में तो उनका अपयश फैल ही जायगा।
अब भी श्रीरामचन्द्रजी अवश्य धनुष चढ़ायेंगे और उनके विवाहोत्सव में त्रिलोकी मंगलगान करेगी।
इस समय राजमहिलाएँ झरोखों से लगकर झाँक रही हैं और बात करते समय उनके दाँत इस प्रकार चमक रहे हैं, जैसे बिजली।
उनके दाँत ऐसे जान पड़ते हैं। मानो बिजली चमक रही हो। वे कामिनियाँ अपने रूप से रति के मद का निरादर करती हुई शोभा पा रही हैं। (सखियों ने सुनयनाजी को) मुनि के समीप दोनों कुमारों को दिखलाया। उनकी छबि देख उनका मन मोहित हो गया।
श्रीरामचन्द्रजी की अत्यन्त अलौकिक शोभा को देख जानकीजी की माता प्रसन्न हुईं और मन-ही-मन कहने लगी कि ‘कहाँ धनुष और कहाँ ये कुमार? वा विधाता की गति बड़ी विपरीत है।
सखियों से प्रिय वचन कहकर रानी सोचने लगी कि कहाँ शिवजी का (कठोर) धनुष और कहाँ यह सुकुमार मूर्ति।
यदि विधाता श्रीरामचन्द्रजी को हमारे नेत्रों का अतिथि न बनाता तो अन्त में राजा को कोई दोष न देता।
अब तो असमंजस की बात हो गयी, कुछ कहते नहीं बनता। इस प्रकार रानी को सोचवश जानकर सखियाँ समझाने लगीं—’हे देवि! सोच को त्याग दीजिये।'
हृदय में आनन्द मनाइये। यह वचन सत्य मानिये कि धनुष को श्रीरामचन्द्रजी ही चढ़ायेंगे।
कौसिक मुनि को तीनों काल का ज्ञान करतलगत है, क्या वे बिना किसी बल के इन बालकों को स्वयंवर में लाते?
मुनि की महिमा सुनकर रानी को धैर्य हुआ। तब सखियों ने रानी को सुबाहु का वध करने वाले श्रीरामचन्द्रजी का यश सुनाया।
यह सुनकर रानी के जी में भरोसा आया और वे हर्षित हो गयीं। फिर उन्होंने रघुनाथजी की ओर देखा, इससे उनका मन प्रेम से आकर्षित हो गया।
राजा, रानी और पुरवासी लोग श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। वे बार-बार मनोहर मनोरथरूपी कलश भरते हैं और उसे खाली कर देते हैं (अर्थात् आशा और निराशा के झूले में झूल रहे हैं)
धनुष को देखकर वे क्षण-क्षण में मनोरथरूपी कलश को भरते और खाली करते हैं और श्रीरामचद्रजी को देखकर सोच करते हैं; समस्त स्त्री-पुरुष हर्ष और विषादवश हृदय में शिवजी को संकुचित करते हैं। (अर्थात् प्रार्थना करके उनसे यह मनाते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हीं का धनुष तोड़ने में समर्थ हों)
तब महाराज जनक की आज्ञा पाकर कुलगुरु शतानन्दजी जानकीजी को ले आये। उस समय रूपराशि श्रीजानकीजी को देखकर सब लोगों ने नेत्रों का फल पाया।
श्रीजानकीजी के सुन्दर शरीर में मंगलमय (विवाहोचित) वस्त्र और आभूषण सुशोभित हैं। उन्हें देखकर मूर्ख राजा लोग मोहवश मोहित हो जाते हैं।
रूप की राशि श्रीजानकीजी जिस ओर स्वभाव से ही निहारती हैं, उसी ओर मानो कामदेव नील कमल के बाणों की झड़ी लगा देता है।
पुरवासी लोग एक क्षण जानकीजी को और दूसरे क्षण श्रीरामचन्द्रजी को निहारते हैं। वे उनके रूप, शील, अवस्था और वंश की विशेषता का विशेषरूप से वर्णन करते हैं।
जब श्रीरामचन्द्रजी को जानकीजी ने और जानकीजी को श्रीरामचन्द्रजी ने देखा, तब दोनों की ओर देख-देखकर कामदेव अपने बाण सुधारने लगा।
श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी परस्पर प्रकट होते हुए प्रेमानन्द को छिपाते हैं, मानो वे अपने हृदय में एक-दूसरे के गुण-गणरूपी स्तम्भ को स्थिरतापूर्वक गाड़ते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी की अवस्था का समय भी स्वभाव से ही शोभायमान है, मानो इस समय यौवनरूपी राजा छबिरूपी नगरी में प्रवेश करना चाहता है।
उस शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता; उसे तो देखने से ही मन प्रसन्न होता है। क्या गूंगा अमृत-पान करके उसके स्वाद को कह सकता है?
तब बंदीजनों ने महाराज जनक की शर्त को स्पष्ट करके सुनाया। उसे सुनकर राजा लोग जोश में आकर उठे, परंतु कोई शकुन नहीं बना।
जब राजाओं को शुभ शकुन नहीं मिला, तब वे बहाना बनाकर बैठ गये। उनमें से कोई धनुष देखने के लिये गये और जैसे बंदर नारियल को टटोलकर छोड़ देता है, वैसे ही वे सब धनुष को टटोलकर सिर नीचा करके बैठ गये।
कोई-कोई बड़े जोश में आते हैं, परंतु सत्पुरुषों के वचनों के समान धनुष टाले नहीं टलता। इस प्रकार राजा नहुष के समान उनके बुद्धि और बल सबके देखते-देखते बरबस क्षीण हो गये। (जब अपने पुण्य के प्रताप से राजा नहुष को इन्द्रपद प्राप्त हुआ, तब उसके मद में उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। उन्होंने इन्द्राणी को भोगने की इच्छा प्रकट की और उसका संदेश पाकर ऋषियों को शिविका में जोड़कर चले। उनमें इस प्रकार के अनौचित्य का विचार करने की भी बुद्धि न रही। अन्त में अगस्त्य ऋषि के शाप से वे तत्काल अजगर हो गये।)
पुरवासी एवं परिवार के सहित महाराज जनक यह देखकर हृदय में हार गये अर्थात् निराश हो गये और राजाओं के समाजरूपी कमलवन को तो मानो पाला मार गया।
(तब) कौशिकमुनि ने महाराज जनक से कहा—’आप आज्ञा दीजिये। सूर्यकुल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी शंकरजी के धनुष को देखें।'
(महाराज जनक ने कहा-) ‘हे मुनिवर! आपके वचन से पर्वत और पृथ्वी भी डोल सकते हैं; तो भी उचित आचरण करने से सब लोग प्रशंसा करते हैं।
(तात्पर्य यह कि यद्यपि आपके आशीर्वाद से श्रीराम के लिये यह धनुष तोड़ना कोई बड़ी बात नहीं है, फिर भी जैसी वस्तुस्थिति है, उसे देखते हुए तो ऐसा होना असम्भव ही जान पड़ता है; क्योंकि देखिये, इस धनुष को देखकर) बाणासुर बाण के समान भाग गया और रावण भी चुपके से (अपने घर) चला गया। भला इनके समान धुरंधर वीर पृथ्वीतल में कौन है।
यह धनुष तो पार्वतीजी के मन के समान अचल है, इसे विचलित करने वाले तो बस एक महादेवजी ही हैं, किंतु वे भी एकनारी व्रत का पालन करने वाले हैं।
ऐसे धनुष को आप इन राजकुमार को देखने के लिये कहते हैं। भला, कहीं सिरस का अत्यन्त कोमल फूल कठोर वज्र के कण को भी भेद सकता है।
श्रीरामचन्द्रजी की रोम-रोम की शोभा अनेक कामदेवों की छबि का भी तिरस्कार करने वाली है। हे मुने! ऐसा न कीजिये कि यह मूर्ति मलिन देखी जाय (क्योंकि यदि इनसे धनुष न टूटा तो इनकी यह प्रसन्नता नष्ट हो जायगी।)
मुनि ने हँसकर कहा, हे जनक! यह मूर्ति जो शोभायमान हो रही है, वह एक बार स्मरण करने से भी सम्पूर्ण अज्ञानान्धकार को दूर कर देने वाली है।
हे जनक! इस मूर्ति को सब प्रकार के मलों को छुड़ाने वाली जानकर यह कौतुक देखो। धनुषरूपी समुद्र में राजाओं का बलरूपी जल बढ़ा हुआ है, (उसे सुखाने के लिये) रघुनाथजी को अगस्त्य के समान जानो।
यह सुनकर राजा जनक सकुचाकर सोचने लगे और (उधर) श्रीरामचन्द्रजी गुरु के चरणों को प्रणाम करके चले। इस समय उनके हृदय में हर्ष या विषाद कुछ भी नहीं था। (उनके चलते समय) बहुत-से शुभ और कल्याणसूचक अच्छे शकुन हुए।
देवता लोग फूल बरसाने और नगारे बजाने लगे; राजा जनक, उनके परिवार के लोग तथा पुरवासी आनन्दित हो गये और राजा लोग लजा गये।
लक्ष्मणजी पृथ्वी और शेषादि से बल बढ़ाने के लिये कहते हैं; क्योंकि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को चढ़ाना चाहते हैं।
जब श्रीरामचन्द्रजी सहज भाव से धनुष के समीप गये, तब परिवारसहित राजा जनक सोच में पड़ गये।
संकोचवश जानकीजी कुछ कह नहीं पाती, मन-ही-मन सोच करती हैं और पार्वती, गणेश तथा महादेवजी का स्मरण करके उन्हें संकोच में डाल रही हैं।
श्रीरामचन्द्रजी को देखकर वे विरह के सरोवर में डूब रही हैं। उस समय उनके बाम भुजा और नेत्र फड़ककर मानो डूबने से बचाने के लिये हाथ बढ़ाते हैं।
इस प्रकार शकुन के बल से कुछ धीरज धरती हैं; परंतु वह स्थिर नहीं रहता। (वे सोचने लगती हैं कि) ‘वर तो किशोरावस्था के हैं और धनुष विकराल है। इस समय विधाता भी अनुकूल नहीं है।’
अन्तर्यामी श्रीरामचन्द्रजी ने जानकीजी का सारा मर्म जान लिया (अर्थात् वे श्रीजानकीजी के मन का दुःख समझ गये)। बस उन्होंने कौतुक से ही धनुष को चढ़ाकर कान तक तान लिया।
श्रीजानकीजी के प्रेम को परखकर श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष को उसी प्रकार तोड़ दिया, जैसे कोई सिंह का बच्चा बड़े भारी हाथी को मार डाले।
धनुष को जब तोड़ा गया, तब उसका ऐसा घोर गर्जन हुआ कि उसे सुनकर पृथ्वी और पर्वत डगमगा गये। श्रीरामचन्द्रजी के सुयशरूपी बहुत से मोतियों से समस्त भुवन-मण्डलरूप सुन्दर पिटारे भर गये।
(अर्थात् चौदहों भुवन में उनका सुयश व्याप्त हो गया) इससे मित्र लोग आनन्दित हुए और शत्रुओं का मुख रुआँसा हो गया। उस समय की धनुष-यज्ञ की छबि को कवि इस प्रकार वर्णन करता है कि प्रातःकाल चकवाचकवी, कुमुदिनी और सघन कमलवन से युक्त तालाब की जैसी शोभा होती है, वैसी ही उस यज्ञ की हुई (भाव यह कि शत्रु लोग तो चकोर और कुमुदिनियों के समान निस्तेज हो गये और सत्पुरुष चकवा-चकवी एवं कमलवन के समान प्रफुल्लित हो गये)
मनोरथरूपी सुन्दर कल्पवृक्ष को लहलहाते देखकर नगर और आकाश में आनन्दपूर्वक मंगल-गान और नगारों का शब्द होने लगा।
तब पुरोहित (शतानन्दजी)-ने समस्त सखियों को गाने की आज्ञा दी और वे (गाती हुई) श्रीजानकीजी को लिवाकर चलीं। इस प्रकार जानकीजी का मनमाना हो गया।
जानकीजी के करकमलों में जयमाला शोभा दे रही है; भला ऐसा कौन कवि है, जो उस अतुलित छबि का वर्णन कर सके।
जानकीजी प्रेम और संकोचवश प्रियतम की ओर देखती हैं, मानो वायु कल्पलता को कल्पवृक्ष की ओर घुमा रहा है।
जयमाल पहनाते समय उनके सुन्दर करकमल ऐसे सुशोभित जान पड़ते हैं मानो कमल कामदेव के फंदे में चन्द्रमा को फँसाते हों।
श्रीराम और जानकीजी की अनुपम शोभा और वह दिन भी अनुपम था। उस सुख-समाज को देखकर रानियों को क्षण-क्षण में आनन्द हो रहा था।
श्रीरामचन्द्रजी को माला पहनाकर सखियाँ जानकीजी को लिवा चलीं; वे ऐसी प्रफुल्लित हो रही हैं जैसे चन्द्रमा का उदय होने से कुमुदिनी की कलियाँ खिल उठती हैं।
देवता लोग आनन्दित होकर जय-जयकार करते हुए फूल बरसाते हैं। उस समय सारे भुवन सुख और स्नेहसे भर गये और श्रीरामचन्द्रजी गुरु के पास गये।
श्रीरामचन्द्रजी गुरु के यहाँ गये। राजा-रानी, स्त्री-पुरुष सब उसी प्रकार आनन्द से भर गये, मानो प्यासे हाथी-हथिनियों का झुंड शीतल अमृतसागर में जा गिरा हो।
कौशिकमुनि की पूजा और प्रशंसा करके उनकी आज्ञा पा राजा सुखी हुए तथा लग्न लिखकर तिलक की सामग्री सजा अपने कुलगुरु (शतानन्दजी)-को अयोध्या भेजा।
राजा ने गुणी लोगों को बुलाकर मण्डप छाने की आज्ञा दी। सुवासिनियाँ (सुहागिनी लड़कियाँ) गीत गाने लगीं और बधावा बजने लगा।
श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी के लिये वे गौरी और गणेश की पूजा करती हैं। (इस प्रकार) सभी परिवार के लोगों एवं पुरजनों के सहित राजा को परम आनन्द हो रहा है।
पहले हरिद्रा-वन्दन करके अर्थात् हल्दी चढ़ाकर मंगल-गान करती हैं और कुल की रीति करके कलश-स्थापन कर तेल चढ़ाती हैं।
(इधर) मुनि (शतानन्द)-ने अयोध्या पहुँचकर सरयू में स्नान किया और सौ करोड़ नाम जपने का फल पाया।
शतानन्दमुनि का आगमन सुनकर महाराज (दशरथ) आगे आये और पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर मुनि ने कुशल सुनाकर उन्हें लग्नपत्रिका दी। (इससे) राजा दशरथ बहुत हर्षित हुए।
इस समाचार को सुनकर नगर में बड़ा आनन्द हुआ और बधावे बजने लगे। सब ओर (विवाहार्थ) मंगल-कलश सजाये जाने लगे और जहाँ-तहाँ वितान (चाँदनियाँ) ताने गये।
महाराज (दशरथ) (अन्य) सब कामों को छोड़कर बरात का सामान सजाने लगे और बरात बनाकर गणेशजी का पूजन करके चल पड़े।
ढोल और नगारे बज रहे हैं और शुभ शकुन हो रहे हैं। इस प्रकार जानकीजी का नैहर जनकौर (जनकपुर) समीप आ गया।
बरात नगर के समीप पहुँच गयी। तब सब लोग प्रसन्न होकर अगवानी लेने (स्वागत करने) गये। सब एक-दूसरे को देखते और मिलते हैं तथा आप्तकाम होकर बड़ा प्रेम मानते हैं।
नगर में बड़ा आनन्द, कौतुक (खेल) और कोलाहल (हल्ला) हो रहा है। उसका वर्णन कहाँ हो सकता है। फिर बरात को ले जाकर जहाँ सब प्रकार का नित्य-नूतन सुभीता था, वहाँ जनवासा दिया। (बरात को ठहराया गया)
कौशिकमुनि श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी को साथ लिये जनवासे में गये और बरात को देखकर अति आनन्दित हुए, उनका हृदय प्रेम से प्रफुल्लित था।
महाराज ने श्रीराम और लक्ष्मण को हृदय से लगाकर गोद में बिठा लिया। उस समय उन्हें अत्यन्त आनन्द हुआ। उस अनुपम आनन्द को सैकड़ों शेष भी वर्णन नहीं कर सकते।
महाराज दशरथ ने कौशिकमुनि की पूजा करके ब्राह्मणों को दान दिये और श्रीरामचन्द्रजी के कल्याण के लिये सब प्रकार के मांगलिक कृत्य किये।
जो संसार के नेत्ररूपी कमलों को विकसित करने वाले सूर्य के समान हैं। वे भूषणों के भूषण श्रीरामचन्द्रजी विवाह के आभूषणों से भूषित हैं।
वे बरात के मध्य में अत्यन्त प्रसन्न चित्त से सुशोभित हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो कामदेव के बाग में कल्पवृक्ष फूला हुआ हो।
महाराज जनक ने अनेक प्रकार के बहुत-से उपहार भेजे, जिन्हें देखकर देवता (भी) ईर्ष्या करते हैं और बरातियों को भी बड़ा आनन्द होता है।
वसिष्ठजी और शतानन्दजी दोनों कुलगुरुओं ने वेदविहित कुलरीति सम्पन्न की तथा महाराज जनक ने प्रमुदित मन से बरात को बुला भेजा।
(तब) शतानन्दमुनि ने (जनवासे में) जाकर अयोध्यापति (महाराज दशरथ)-से कहा —’पधारिये’ और वे गुरु (वसिष्ठ), गौरी, शिवजी और गणेशजी को स्मरणकर चले।'
महाराज दशरथ गुरु आदि को स्मरणकर चले; देवता लोग फूल बरसाने लगे और अनेक प्रकार के पाँवड़े पड़ने लगे। महाराज जनक ने सब प्रकार से सम्मानित कर श्रीदशरथजी को अपने प्रेम से कृतज्ञ बना लिया।
सब गुणों में तुल्य दोनों समधियों ने परस्पर मिलते समय अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया। उन्हें देखकर देवता, मनुष्य और मुनिजन धन्य-धन्य कहते और जय-जयकार कर रहे हैं।
तीनों लोकों को देखते हैं; (परंतु) कहीं कोई उपमा नहीं मिलती। बस, महाराज दशरथ और जनक के समान तो जनक और दशरथ दो ही हैं।
रनिवास में बड़ा आनन्द है। सब लोग श्रेष्ठ मंगलसाज सजा रहे हैं और कोकिलबयनी कामिनियाँ परिहास करती हुई गान कर रही हैं।
उसे सुनकर पार्वतीजी, लक्ष्मीजी एवं अन्य देवताओं की स्त्रियाँ आनन्दित हुईं और स्त्रियों का सुन्दर छद्म-वेष बनाकर मंडप में गयीं।
वे मंगल आरती सजाकर दुलहे का परिछन करने चलीं, वे ऐसी प्रसन्न हो रही हैं मानो सोने के कमल की कलियाँ सूर्योदय होने पर फूल उठी हों।
जब वे नख से चोटी तक श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर रूप को देखती हैं, तब सभी इन्द्रियों में इन्द्र के-से नेत्रों को ही श्रेष्ठ समझती हैं। (वे सोचती हैं जिस प्रकार इन्द्र के शरीर में हजार नेत्र हैं, वैसे ही हमारे भी रोम-रोम में नेत्र होते तो श्रीरामचन्द्रजी की अनुपम रूपसुधा का कुछ आस्वादन कर पातीं)।
अनुराग एवं सौभाग्य से भरी हुई वे गजगामिनी स्त्रियाँ परम प्रीतिपूर्वक कुलाचार करती हैं किंतु अघाती नहीं।
वे चतुरा स्त्रियाँ रीति-रस्म में देरी नहीं लगातीं, बार-बार श्रीरघुनाथजी को देख करके सुलोचना स्त्रियाँ (महान्) आनन्द का अनुभव करती हैं।
आरती और निछावर करके वे दुलहा को निरखती हैं और प्रेम में मग्न हो जाने से वे प्रेममद से छकी युवती स्त्रियाँ अपने शरीर को भी नहीं सँभाल पातीं।
वे अपने शरीर को नहीं सँभाल पातीं। भगवान् की शोभा (एकटक होकर) निहारती हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो उन्होंने पलकरूपी शत्रुओं को रण में जीत लिया है। इससे उनके नेत्ररूपी चक्रवर्ती राम-छबिरूप सुराज्य के सुख के भोगी हुए हैं।
तब जनकजी ने समाजसहित महाराज दशरथ को सुन्दर आसन दिये और कौशिकमुनि तथा वसिष्ठजी की पूजा करके नवीन वस्त्र अर्पण कर महाराज दशरथ की पूजा की।
(फिर जानकीजी की कुछ) सखियाँ श्रीरामचन्द्रजी को अर्घ्य देती हुई मण्डप में लिवा चलीं। वे आनन्द में उमँगकर मनोहर मंगलगान करती हैं।
दूल्हा राम मण्डप में विराजमान हो संसार को विशेषरूप से मोहित कर रहे हैं; वे ऐसे भले लगते हैं, मानो वसन्त-ऋतु में कामदेव वन के मध्य में शोभायमान हैं।
जहाँ जिस प्रकार की वैदिक विधि और कुलव्यवहार की आवश्यकता होती है, वहाँ दोनों पुरोहित प्रसन्न-मन से वैसा ही करते हैं।
राजा जनक ने वर का पूजन करके सुन्दर सिंहासन दिया और सखियाँ आज्ञा पा दुलहिन को लेकर चलीं।
स्त्रियों के झुंड में जानकीजी स्वभाव से ही शोभा पा रही हैं। सरस्वती उपमा कहने में लजाकर भाग जाती हैं।
दुलहा और दुलहिन को देखकर स्त्री-पुरुष हर्षित होते हैं और क्षण-क्षण में गीत गाते और नगारे बजाते हुए देवता लोग फूल बरसाते हैं।
सुवासिनियाँ दूल्हा और दुलहिन का नाम ले-लेकर मंगल गाती हैं और कुमार-कुमारी के कल्याण के लिये (उनसे) गणेशजी तथा पार्वतीजी की पूजा कराती हैं।
मिथिलापति (महाराज जनक)-ने अग्नि-स्थापन करके कुश और जल लिया तथा कन्या-दान की विधि के लिये संकल्प किया।
महाराज जनक ने संकल्प करके शील, सुख और शोभामयी श्रीजानकीजी भगवान् राम को समर्पण कर दीं - (ठीक उसी तरह) जैसे गिरिराज हिमवान् ने शंकरजी को पार्वतीजी और सागर ने भगवान् श्रीहरि को लक्ष्मीजी समर्पण की थीं।
सिंदूर-वन्दन तथा लाजाहोम की विधि सम्पन्न करके भाँवर होने लगी। फिर सिलपोहनी (अश्मारोहण) विधि की गयी। (उस समय) भगवान् की मन-मोहिनी साँवली मूर्ति ने सबके मन हर लिये।
इस प्रकार विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ और तीनों लोक में आनन्द छा गया। मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं और देवता फूल बरसाते हैं।
विधाता ने जो कुछ हमारे मन को प्रिय लगता था, वही कर दिया यह सोचकर (सभी) स्त्रियाँ आनन्दित हुईं और फिर (जानकीजी) सखियाँ दूल्हा और दुलहिन को लेकर कोहबर (कुलदेवता के स्थान) में गयीं।
उन्हें निरख-निरखकर वे क्षण-क्षण में वस्त्र और मणियाँ निछावर करती हैं। विनोद और आनन्द से पूर्ण उस दिन का वर्णन नहीं किया जा सकता।
जिस समय जानकीजी के भाई की आवश्यकता हुई, उस समय वहाँ (पृथ्वी का पुत्र) मंगलग्रह (स्वयं) आया और अपने को छिपाकर सब रीति-रस्म करके अपना सुन्दर सम्बन्ध जनाया।
चतुर स्त्रियाँ वर और दुलहिन को कुलरीति सिखाती हैं और लहकौरी की विधि के समय गाली गाकर सुख मानती हैं।
जुआ खेलाने में चतुर स्त्रियों ने बड़ा कौतुक किया। वे हार-जीत का बहाना करके (कौसल्या और सुनयना) दोनों रानियों को गाली देती थीं।
जानकीजी की माता मन में आनन्दित हो आरती उतारती हैं। उस आनन्द को कौन कह सकता है। उस समय सरस्वती भी आनन्दमग्न हो रही हैं।
इस प्रकार युवतियों का झुंड और सम्पूर्ण रनिवास समस्त मंगलों की खानि श्रीरामजानकी को देख-देखकर आनन्द के वशीभूत हो रहा है।
महाराज जनक के छोटे भाई (कुशध्वज)-की जो परम सुन्दरी कन्याएँ थीं, उनमें बड़ी (माण्डवी)-का विवाह भरतजी के साथ हुआ, जो सुन्दरता में सैकड़ों रतियों के समान थी।
जानकीजी की छोटी बहिन (उर्मिला), लक्ष्मणजी को ब्याही गयी जो रूप के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध थी; और लक्ष्मणजी के छोटे भाई शत्रुघ्नजी का विवाह श्रुतिकीर्ति से हुआ, जो सब गुणों की खानि थी।
श्रीरामचन्द्रजी के विवाह के समान ही (अन्य) तीनों विवाह (भी) हुए। इस प्रकार विधाता ने सभी को जीवन का फल और नेत्रों का फल दिया।
दासी-दास, घोड़े-हाथी, सोना-वस्त्र और मणि इत्यादि अनेक प्रकार का दहेज दिया गया, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
दान, आदर-सत्कार और परले-सिरे के प्रेम द्वारा महाराज जनक ने सबको परितृप्त कर दिया और सारी बरात के सहित समधी (दशरथजी)-को विनयपूर्वक अपने वशीभूत कर लिया।
फिर महाराज संग में पुत्र और पुत्रवधुओं को लेकर जनवासे में गये; (ऐसा लगता था) मानो उन्होंने चारों साधनों के सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) प्राप्त कर लिये।
तरह-तरह से (भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य) चारों प्रकार का भोजन बनाया गया; बरातियों के सहित महाराज दशरथ भोजन करने लगे।
सुन्दरी स्त्रियाँ दोनों ओर के नाम ले-लेकर गालियाँ गाने लगीं, भोजन करते समय उनके हृदय में आनन्द की बाढ़ आ गयी; इससे वह रात्रि बड़ी ही सुहावनी जान पड़ती थी।
वह रात्रि बड़ी सुहावनी हो गयी। स्त्रियाँ मधुर गान करती थीं। अच्छे-अच्छे बाजे बज रहे थे। इस प्रकार भोजन-पान से निवृत्त हो महाराज आनन्द प्राप्त कर जनवासे को चले।
नट, भाट, मागध, सूत और याचकगण महाराज के सुयश और प्रताप का वर्णन कर रहे थे और ब्राह्मणवृन्द को आनन्दपूर्वक मणि और हाथी आदि देते-देते उनका मन हटता न था, अर्थात् बराबर देते ही रहने की इच्छा होती थी।
महाराज जनक ने विनती कर-करके कुछ दिन बरातियों को रोककर रखा और उनकी असंख्य प्रकार से पहुनाई की।
महाराज की रानियों ने जब सुना कि प्रातःकाल बरात चली जायगी, तब भावी वियोग की चिन्ता से उन्हें नींद न पड़ी और सारी रात बीत गयी।
नगर में खलबली मच गयी, समस्त स्त्री-पुरुष विधाता से यही मनाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी बारबार ससुराल आया करें।
महाराज जनक ने बरात के चलने का सारा साज सजाया और फिर भाइयों के सहित श्रीरामचन्द्रजी राजमहल में गये।
सासुएँ आरती उतारकर निछावर करती हैं और उनकी साँवली मूर्ति को देख-देखकर हृदय में आनन्दित होती हैं।
तब श्रीरामचन्द्रजी ने (उन सबसे) विदा माँगी। यह सुनकर वे सब करुणा (शोक)-से भर गयीं और संकोच छोड़कर प्रेमपूर्वक उनके चरणों पर गिर गयीं।
वे जानकीजी के सहित सब पुत्रियों को (अपने-अपने पति को) सौंपकर हाथ जोड़ती हैं और बार-बार श्रीरामचन्द्रजी को निहारकर उनसे विनय करती हैं—
हे तात! आप हमारे प्रति स्नेह न छोड़ियेगा। हृदय में दया बनाये रखियेगा और पुर तथा पुरजनसहित महाराज को अपना अनुचर समझियेगा।
'हम आपकी बलिहारी जाती हैं, आप अपना सेवक जानकर इनपर स्नेह रखियेगा’ यों कहकर रानियाँ दीन वचन सुनाती हैं और अत्यन्त प्रेम से – (चारों) बालिकाओं को बार-बार हृदय से लगाती हैं।
जानकीजी के चलने पर नगर के पुरुष, स्त्रियाँ, घोड़े, हाथी, पक्षी और मृग-सभी व्याकुल हो गये। [इस प्रकार सासुओं की विनय सुनकर और उनको समझाकर श्रीरामचन्द्रजी पिताजी के पास गये।
नगारों पर चोट पड़ने लगी और महाराज दशरथ अयोध्या के लिये चल पड़े। देवगण फूल बरसाते हैं और अच्छे-अच्छे (शुभसूचक) सगुन होते हैं।
जनकजी ने जानकीजी से मिलकर उन्हें शिक्षा दी और मन्त्री, गुरु तथा भाई के सहित उन्हें पहुँचाने चले।
महाराज दशरथ ने प्रेम से पुलकित होकर कहा —’राजन्! अब आप लौट जाइये।’ फिर समस्त गुणों के पात्र दोनों महाराज परस्पर विनय करने लगे।
महाराज जनक ने हाथ जोड़कर कहा—’आपने मुझे अपना लिया, हे रघुकुलतिलक! आप सदा ही उजड़ों को बसाने वाले हैं।'
मैंने आपको बुला भेजा—’मेरे इस व्यवहार से बुरा न मानियेगा। प्रभु (आप)-की (ही) कृपा से आपका सुयश जानकर मैंने सब प्रकार का सुख पाया है।'
फिर महाराज ने वसिष्ठ आदि मुनियों की वन्दना करके श्रीविश्वामित्रजी के चरण पकड़कर अत्यन्त विनती की।
महाराज जनक फिर भाइयों के साथ श्रीरामचन्द्रजी से विनय करने लगे। आनन्द से उनका कण्ठ भर आया, नेत्रों में जल उमड़ आया और हृदय में धीरज धरकर कहने लगे,
हे कृपासिन्धु, हे सुखसागर, हे सुजान-शिरोमणि, हे तात! समय-समय पर आप हमारी याद करते रहियेगा। (हमारे प्रति) स्नेह न त्यागियेगा।
स्नेह न छोड़ियेगा - इस विनय को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत विनती की और महाराज जनक (सबसे) प्रेमसहित मिल-भेंटकर तथा मन में धीरज धारण कर लौट आये।
उस अवसर के विषय में कुछ कहते नहीं बनता; सम्पूर्ण लोक करुणा (शोक)-से भर गये। तब कोसलपति महाराज दशरथ ने प्रस्थान किया और आनन्दपूर्वक नगारे बजने लगे।
मार्ग में भृगुनाथ (परशुरामजी) हाथ में फरसा लिये मिले। वे आँख दिखाकर तीव्र क्रोध की मुद्रा धारण किये डाँटने लगे।
किंतु श्रीरामचन्द्रजी ने परशुरामजी को संतुष्ट किया और वे रोष एवं अमर्ष को त्यागकर भगवान् को धनुष सौंप अपने नेत्रों को सुफल करके चले गये।
श्रीरामचन्द्रजी के बाहुबल को देखकर बरातियों को बड़ा हर्ष हुआ और विधाता को सब प्रकार सम्मुख अर्थात् अनुकूल जानकर महाराज दशरथ प्रसन्न हुए।
इस प्रकार सब पुत्रों का ब्याह करके उन्होंने समस्त संसार में अपने सुयश का विस्तार किया और (फिर) रास्ते में लोगों को सुख देते हुए अवधपति दशरथजी (अपनी राजधानी को) लौट आये।
सुन्दर मंगलमय शकुन हो रहे हैं, देवता फूल बरसाते हैं। नगर में कोलाहल हो गया, समस्त स्त्री-पुरुष आनन्दित हो रहे हैं।
वे घाट, बाट, पुर, द्वार और बाजारों को सुसज्जित करते हैं और गलियों को सुगन्ध से सींचकर सुमंगल गाते हैं।
सुन्दर चौक पूरकर कलश और ध्वजाएँ सजाते हैं। अनेक प्रकार के आनन्दमय बाजे बज रहे हैं।
घर-घर में वन्दनवार, पताका और चँदोवे विराजमान हैं तथा फल और पल्लवों के सहित मंगलमय वृक्ष लगाये गये हैं।
बहुत-से सुन्दर मंगलमय वृक्ष लगाये गये हैं, मृगशावक के-से नेत्रों वाली समस्त स्त्रियाँ थालों में दही, दूब, अक्षत और गोरोचन भरकर आरती सजाती हैं तथा
कौसल्या, सुमित्रा आदि सम्पूर्ण राजमहिषियाँ मन में अत्यन्त आनन्दित हैं। मतवाले हाथियोंकी-सी चाल से चलने वाली वे महारानियाँ सब सामग्री सजाकर श्रीरामचन्द्रजी का परिछन करने चलीं।
माताएँ वधुओं के सहित चारों पुत्रों को निहारती हैं और प्रसन्न होकर बारंबार उनकी आरती उतारती हैं।
वे क्षण-क्षण में मंगल और आनन्द से भरकर उनकी निछावर करती हैं और दूल्हा-दुलहिनों को देखकर प्रेम के समुद्र में डूब गयी हैं।
वे पावड़ें बिछाती और अर्घ्य देती हुई उन्हें आदरपूर्वक लिवा चलीं। उस समय समस्त लोकों में तथा पृथ्वी एवं आकाश में आनन्द उमड़ चला।
स्त्रियाँ ओहार अर्थात् पर्दा उठाकर दुलहिनियों को देखती हैं और नेत्रों का लाभ पाकर जन्म को सफल समझती हैं।
उन्हें सम्मानपूर्वक राजमहल में लाकर सब प्रकार के मंगलकृत्य किये और ब्राह्मणों को वस्त्र, सोना, मणि और गौएँ दान की।
याचकों को (मनमाना दान देकर) निहाल कर दिया। वे जहाँ-तहाँ आशीर्वाद देते हैं और श्रीरामचन्द्रजी की उन्नति के लिये देवता और पितृगण सभी का पूजन किया गया।
रीति के अनुसार नेग-चार करके अपने सम्बन्धियों को, सब सुवासिनियों को, अपने से बड़ी स्त्रियों को और पौनियों (अपने आश्रित निम्न जाति की स्त्रियों)-को पहिरावनी दी।
वे सब (वर-दुलहिनों की) चारों जोड़ियों को आशीर्वाद देती हुई निकलती हैं और मन में ऐसी प्रसन्न होती हैं जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर कुमुदिनियाँ आनन्द से खिल उठती हैं।
जैसे चन्द्रमा को देखकर कुमुदिनियाँ खिल उठती हैं वैसे ही सब स्त्रियाँ आनन्दित हैं। उस समय अयोध्या सुखी और शोभामयी हो रही हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की सुन्दर नवीन कीर्ति को कवि लोग गाते हैं।
जो लोग भगवान् के यज्ञोपवीत और श्रीसीताराम के विवाहोत्सव-सम्बन्धी मंगल का गान करते हैं, गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि वे स्त्री-पुरुष दिनोदिन सब प्रकार का कल्याण प्राप्त करते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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