जनकहि एक सिहाहिं देखि सनमानत।
बाहर भीतर भीर न बनै बखानत ॥
कोई राजा जनक को अतिथियों का सम्मान करते देखकर उनसे ईर्ष्या करते हैं। इस समय बाहर-भीतर सर्वत्र इतनी भीड़ हो रही है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता।
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