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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 156
सजहिं सुमंगल साज रहस रनिवासहि। गान करहिं पिकबैनि सहित परिहासहि॥
रनिवास में बड़ा आनन्द है। सब लोग श्रेष्ठ मंगलसाज सजा रहे हैं और कोकिलबयनी कामिनियाँ परिहास करती हुई गान कर रही हैं।
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