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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 87
अब असमंजस भयउ न कछु कहि आवै। रानिहि जानि ससोच सखी समझावै॥
अब तो असमंजस की बात हो गयी, कुछ कहते नहीं बनता। इस प्रकार रानी को सोचवश जानकर सखियाँ समझाने लगीं—’हे देवि! सोच को त्याग दीजिये।'
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