अब असमंजस भयउ न कछु कहि आवै।
रानिहि जानि ससोच सखी समझावै॥
अब तो असमंजस की बात हो गयी, कुछ कहते नहीं बनता। इस प्रकार रानी को सोचवश जानकर सखियाँ समझाने लगीं—’हे देवि! सोच को त्याग दीजिये।'
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जानकी मंगल के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
जानकी मंगल के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।