चितइ न सकहु राम तन गाल बजावहु।
बिधि बस बलउ लजान सुमति न लजावहु॥
देखो, तुम श्रीरामचन्द्रजी की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते, बेमतलब गाल बजाते हो। प्रारब्धवश तुम लोगों का बल तो लजा ही गया, अब व्यर्थ अपनी सुबुद्धि को मत लजाओ।
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