सीय मातु मन मुदित उतारति आरति।
को कहि सकइ अनंद मगन भइ भारति॥
जानकीजी की माता मन में आनन्दित हो आरती उतारती हैं। उस आनन्द को कौन कह सकता है। उस समय सरस्वती भी आनन्दमग्न हो रही हैं।
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