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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 160
परम प्रीति कुलरीति करहिं गज गामिनि। नहिं अघाहिं अनुराग भाग भरि भामिनि॥
अनुराग एवं सौभाग्य से भरी हुई वे गजगामिनी स्त्रियाँ परम प्रीतिपूर्वक कुलाचार करती हैं किंतु अघाती नहीं।
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