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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 70
कस न पिअहु भरि लोचन रूप सुधा रसु। करह कृतारथ जन्म होहु कत नर पसु॥
तुम लोग श्रीरामचन्द्रजी के अमृतमय रूपरस को नेत्र भरकर क्यों नहीं पीते? अपने जन्म को कृतार्थ कर लो। नर-पशु क्यों बनते हो?
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