कस न पिअहु भरि लोचन रूप सुधा रसु।
करह कृतारथ जन्म होहु कत नर पसु॥
तुम लोग श्रीरामचन्द्रजी के अमृतमय रूपरस को नेत्र भरकर क्यों नहीं पीते? अपने जन्म को कृतार्थ कर लो। नर-पशु क्यों बनते हो?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जानकी मंगल के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
जानकी मंगल के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।