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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 166
बर बिराज मंडप महँ बिस्व बिमोहइ। ऋतु बसंत बन मध्य मदनु जनु सोहइ॥
दूल्हा राम मण्डप में विराजमान हो संसार को विशेषरूप से मोहित कर रहे हैं; वे ऐसे भले लगते हैं, मानो वसन्त-ऋतु में कामदेव वन के मध्य में शोभायमान हैं।
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