अब करि पइज पंच महँ जो पन त्यागे।
बिधि गति जानि न जाइ अजसु जग जागै॥
किंतु अब प्रण करके यदि वे पंचों में (जनसमुदाय में) अपना प्रण त्यागते हैं तो विधाता की गति तो जानी नहीं जाती, किंतु संसार में तो उनका अपयश फैल ही जायगा।
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