रिषि संग सोहत जात मग छबि बसत सो तुलसी हिएँ।
कियो गवन जनु दिननाथ उत्तर संग मधु माधव लिएँ॥
वे ऋषि के साथ मार्ग पर चलते हुए अत्यन्त शोभायमान हो रहे हैं, उनकी वह छबि तुलसीदास के हृदय में बस गयी है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो मधु (चैत्र) और माधव (वैशाख)-के साथ सूर्यदेव उत्तर दिशा को जा रहे हैं।
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