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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 187
दान मान परमान प्रेम पूरन किए। समधी सहित बरात बिनय बस करि लिए॥
दान, आदर-सत्कार और परले-सिरे के प्रेम द्वारा महाराज जनक ने सबको परितृप्त कर दिया और सारी बरात के सहित समधी (दशरथजी)-को विनयपूर्वक अपने वशीभूत कर लिया।
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