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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 230
जोरीं चारि निहारि असीसत निकसहिं। मनहुँ कुमुद बिधु-उदय मुदित मन बिकसहिं॥
वे सब (वर-दुलहिनों की) चारों जोड़ियों को आशीर्वाद देती हुई निकलती हैं और मन में ऐसी प्रसन्न होती हैं जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर कुमुदिनियाँ आनन्द से खिल उठती हैं।
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