पुरवासी लोग एक क्षण जानकीजी को और दूसरे क्षण श्रीरामचन्द्रजी को निहारते हैं। वे उनके रूप, शील, अवस्था और वंश की विशेषता का विशेषरूप से वर्णन करते हैं।
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