तब जनक आयसु पाइ कुलगुर जानकिहि लै आयऊ।
सिय रूप रासि निहारि लोचन लाहु लोगन्हि पायऊ॥
तब महाराज जनक की आज्ञा पाकर कुलगुरु शतानन्दजी जानकीजी को ले आये। उस समय रूपराशि श्रीजानकीजी को देखकर सब लोगों ने नेत्रों का फल पाया।
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