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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 163
नहिं तन सम्हारहिं छबि निहारहिं निमिष रिपु जनु रनु जए। चक्रवै लोचन राम रूप सुराज सुख भोगी भए॥
वे अपने शरीर को नहीं सँभाल पातीं। भगवान् की शोभा (एकटक होकर) निहारती हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो उन्होंने पलकरूपी शत्रुओं को रण में जीत लिया है। इससे उनके नेत्ररूपी चक्रवर्ती राम-छबिरूप सुराज्य के सुख के भोगी हुए हैं।
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