सिय मातु हरषी निरखि सुषमा अति अलौकिक रामकी।
हिय कहति कहँ धनु कुँअर कहँ बिपरीत गति बिधि बाम की॥
श्रीरामचन्द्रजी की अत्यन्त अलौकिक शोभा को देख जानकीजी की माता प्रसन्न हुईं और मन-ही-मन कहने लगी कि ‘कहाँ धनुष और कहाँ ये कुमार? वा विधाता की गति बड़ी विपरीत है।
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