अन्तर्यामी श्रीरामचन्द्रजी ने जानकीजी का सारा मर्म जान लिया (अर्थात् वे श्रीजानकीजी के मन का दुःख समझ गये)। बस उन्होंने कौतुक से ही धनुष को चढ़ाकर कान तक तान लिया।
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