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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 100
राम सीय बय समौ सुभाय सुहावन। नृप जोबन छबि पुरइ चहत जनु आवन॥
श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी की अवस्था का समय भी स्वभाव से ही शोभायमान है, मानो इस समय यौवनरूपी राजा छबिरूपी नगरी में प्रवेश करना चाहता है।
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