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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 73
मनसिज मनोहर मधुर मूरति कस न सादर जोवहू। बिनु काज राज समाज महुँ तजि लाज आपु बिगोवहू॥
अरे, कामदेव के भी मन को चुराने वाली इन मधुर मूर्तियों को तुम सादर क्यों नहीं निहारते? तुम बिना ही प्रयोजन इस राज-समाज में लज्जा त्यागकर अपने को नष्ट करते हो।
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