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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 162
करि आरती निछावरि बरहि निहारहिं। प्रेम मगन प्रमदागन तन न सँभारहिं॥
आरती और निछावर करके वे दुलहा को निरखती हैं और प्रेम में मग्न हो जाने से वे प्रेममद से छकी युवती स्त्रियाँ अपने शरीर को भी नहीं सँभाल पातीं।
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