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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 83
जनु दमक दामिनि रूप रति मद निदरि सुंदरि सोहहीं। मुनि ढिग देखाए सखिन्ह कुँवर बिलोकि छबि मन मोहहीं॥
उनके दाँत ऐसे जान पड़ते हैं। मानो बिजली चमक रही हो। वे कामिनियाँ अपने रूप से रति के मद का निरादर करती हुई शोभा पा रही हैं। (सखियों ने सुनयनाजी को) मुनि के समीप दोनों कुमारों को दिखलाया। उनकी छबि देख उनका मन मोहित हो गया।
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