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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 44
नृप गहे पाय असीस पाई मान आदर अति किएँ। अवलोकि रामहि अनुभवत मनु ब्रह्मसुख सौगुन किएँ॥
महाराज ने मुनिवर के चरण पकड़े और उनसे आशीर्वाद पाया, फिर उनका अत्यन्त आदर-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर तो वे अपने मन में मानो सौगुना ब्रह्मसुख अनुभव कर रहे थे।
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