मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 125
नभ पुर मंगल गान निसान गहागहे। देखि मनोरथ सुरतरु ललित लहालहे॥
मनोरथरूपी सुन्दर कल्पवृक्ष को लहलहाते देखकर नगर और आकाश में आनन्दपूर्वक मंगल-गान और नगारों का शब्द होने लगा।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
जानकी मंगल के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

जानकी मंगल के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें