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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 158
मंगल आरति साज बरहि परिछन चलीं। जन बिगसीं रबि उदय कनक पंकज कलीं॥
वे मंगल आरती सजाकर दुलहे का परिछन करने चलीं, वे ऐसी प्रसन्न हो रही हैं मानो सोने के कमल की कलियाँ सूर्योदय होने पर फूल उठी हों।
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