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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 124
हित मुदित अनहित रुदित मुख छबि कहत कबि धनु जाग की। जनु भोर चक्क चकोर कैरव सघन कमल तड़ाग की॥
(अर्थात् चौदहों भुवन में उनका सुयश व्याप्त हो गया) इससे मित्र लोग आनन्दित हुए और शत्रुओं का मुख रुआँसा हो गया। उस समय की धनुष-यज्ञ की छबि को कवि इस प्रकार वर्णन करता है कि प्रातःकाल चकवाचकवी, कुमुदिनी और सघन कमलवन से युक्त तालाब की जैसी शोभा होती है, वैसी ही उस यज्ञ की हुई (भाव यह कि शत्रु लोग तो चकोर और कुमुदिनियों के समान निस्तेज हो गये और सत्पुरुष चकवा-चकवी एवं कमलवन के समान प्रफुल्लित हो गये)
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