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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 165
देत अरघ रघुबीरहि मंडप लै चलीं। करहिं सुमंगल गान उमगि आनँद अलीं॥
(फिर जानकीजी की कुछ) सखियाँ श्रीरामचन्द्रजी को अर्घ्य देती हुई मण्डप में लिवा चलीं। वे आनन्द में उमँगकर मनोहर मंगलगान करती हैं।
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