महाराज से उत्तर देते नहीं बनता—यह देखकर वसिष्ठजी ने अनेक प्रकार से राजा को समझाया। उन्होंने इधर तो विश्वामित्रजी के तप और तेज का वर्णन किया और उधर कुछ श्रीरामचन्द्रजी का प्रभाव समझाया।
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