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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 33
बिरचे बिरंचि बनाइ बाँची रुचिरता रंचौ नहीं। दस चारि भुवन निहारि देखि बिचारि नहिं उपमा कहीं॥
ब्रह्माजी ने इन्हें ऐसा सँवारकर रचा है कि मानो इन्हें छोड़कर अब थोड़ी-सी भी सुन्दरता शेष नहीं रही। चौदहों भुवन में बहुत विचारपूर्वक देखा, परंतु कहीं भी इनकी उपमा नहीं है।
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