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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 153
चले सुमिरि गुर सुर सुमन बरषहिं परे बहुबिधि पावड़े। सनमानि सब बिधि जनक दसरथ किये प्रेम कनावड़े॥
महाराज दशरथ गुरु आदि को स्मरणकर चले; देवता लोग फूल बरसाने लगे और अनेक प्रकार के पाँवड़े पड़ने लगे। महाराज जनक ने सब प्रकार से सम्मानित कर श्रीदशरथजी को अपने प्रेम से कृतज्ञ बना लिया।
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