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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 37
देखि बिनोद प्रमोद प्रेम कौसिक उर। करत जाहिँ घन छाह सुमन बरषहि सुर॥
श्रीरामचन्द्रजी के आमोद-प्रमोद को देखकर कौशिकमुनि के हृदय में प्रेम उमड़ आता है। मार्ग में मेघ छाँह किये जाते हैं और देवता लोग फूल बरसाते जाते हैं।
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