रितवहिं भरहिं धनु निरखि छिनु-छिनु निरखि रामहि सोचहीं।
नर नारि हरष बिषाद बस हिय सकल सिवहिं सकोचहीं॥
धनुष को देखकर वे क्षण-क्षण में मनोरथरूपी कलश को भरते और खाली करते हैं और श्रीरामचद्रजी को देखकर सोच करते हैं; समस्त स्त्री-पुरुष हर्ष और विषादवश हृदय में शिवजी को संकुचित करते हैं। (अर्थात् प्रार्थना करके उनसे यह मनाते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हीं का धनुष तोड़ने में समर्थ हों)
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