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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 15
कौसिक दीन्हि असीस सकल प्रमुदित भईं। सींची मनहुँ सुधा रस कलप लता नईं॥
विश्वामित्रजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इससे वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुईं, मानो उन्होंने नवीन कल्प-लताओं को अमृतरस से सींच दिया हो।
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