राजाओं को ऐसी शिक्षा देकर वे साधुस्वभाव नृपतिगण उनकी अनुपम छबि निरखने लगे। उस समय रघुकुलकुमुदचन्द्र श्रीरामजी को देखकर चकोर के समान उनके नेत्र चन्द्रमा को देखने वाले चकोर पक्षी के समान ठग गये अर्थात् उन्हीं की ओर लगे रह गये।
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