राम दीख जब सीय सीय रघुनायक।
दोउ तन तकि तकि मयन सुधारत सायक॥
जब श्रीरामचन्द्रजी को जानकीजी ने और जानकीजी को श्रीरामचन्द्रजी ने देखा, तब दोनों की ओर देख-देखकर कामदेव अपने बाण सुधारने लगा।
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