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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 225
देत पावड़े अरघ चलीं लै सादर। उमगि चलेउ आनंद भुवन भुइँ बादर॥
वे पावड़ें बिछाती और अर्घ्य देती हुई उन्हें आदरपूर्वक लिवा चलीं। उस समय समस्त लोकों में तथा पृथ्वी एवं आकाश में आनन्द उमड़ चला।
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