सो छबि जाइ न बरनि देखि मनु मान।
सुधा पान करि मूक कि स्वाद बखानै॥
उस शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता; उसे तो देखने से ही मन प्रसन्न होता है। क्या गूंगा अमृत-पान करके उसके स्वाद को कह सकता है?
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