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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 128
सीय सनेह सकुच बस पिय तन हेरइ। सुरतरु रुख सुरबेलि पवन जनु फेरइ॥
जानकीजी प्रेम और संकोचवश प्रियतम की ओर देखती हैं, मानो वायु कल्पलता को कल्पवृक्ष की ओर घुमा रहा है।
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