राजत राज समाज जुगल रघुकुल मनि।
मनहुँ सरद बिधु उभय नखत धरनी धनि॥
उस राजाओं की सभा में वे दोनों रघुकुलमणि इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो शरत्काल के दो चन्द्रमा नक्षत्ररूपी राजाओं के मध्य शोभायमान हों।
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