देखि मनोहर मूरति मन अनुरागेउ।
बँधेउ सनेह बिदेह बिराग बिरागेउ॥
उस मनोहर मूर्ति को देखकर महाराज जनक के मन में प्रेम उत्पन्न हो गया। वे प्रेम में बँध गये और उनका सारा वैराग्य विरक्त हो गया (अर्थात् जाता रहा)।
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