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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 133
गए राम गुरु पहिं राउ रानी नारि-नर आनंद भरे। जनु तृषित करि करिनी निकर सीतल सुधासागर परे॥
श्रीरामचन्द्रजी गुरु के यहाँ गये। राजा-रानी, स्त्री-पुरुष सब उसी प्रकार आनन्द से भर गये, मानो प्यासे हाथी-हथिनियों का झुंड शीतल अमृतसागर में जा गिरा हो।
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