तब उपरोहित कहेउ सखीं सब गावन।
चलीं लेवाइ जानकिहि भा मन भावन॥
तब पुरोहित (शतानन्दजी)-ने समस्त सखियों को गाने की आज्ञा दी और वे (गाती हुई) श्रीजानकीजी को लिवाकर चलीं। इस प्रकार जानकीजी का मनमाना हो गया।
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