नख सिख सुंदर राम रूप जब देखहिं।
सब इंद्रिन्ह महँ इंद्र बिलोचन लेखहिं॥
जब वे नख से चोटी तक श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर रूप को देखती हैं, तब सभी इन्द्रियों में इन्द्र के-से नेत्रों को ही श्रेष्ठ समझती हैं। (वे सोचती हैं जिस प्रकार इन्द्र के शरीर में हजार नेत्र हैं, वैसे ही हमारे भी रोम-रोम में नेत्र होते तो श्रीरामचन्द्रजी की अनुपम रूपसुधा का कुछ आस्वादन कर पातीं)।
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