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जानकी मंगल • अध्याय 1 • श्लोक 177
निरखि निछावर करहि बसन मनि छिनु छिन्। जाइ न बरनि बिनोद मोदमय सो दिनु॥
उन्हें निरख-निरखकर वे क्षण-क्षण में वस्त्र और मणियाँ निछावर करती हैं। विनोद और आनन्द से पूर्ण उस दिन का वर्णन नहीं किया जा सकता।
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