सिय चलत पुरजन नारि हय गय बिहँग मृगब्याकुल भए।
सुनि बिनय सासु प्रबोधि तब रघुबंस मनिपितु पहिं गए॥
जानकीजी के चलने पर नगर के पुरुष, स्त्रियाँ, घोड़े, हाथी, पक्षी और मृग-सभी व्याकुल हो गये। [इस प्रकार सासुओं की विनय सुनकर और उनको समझाकर श्रीरामचन्द्रजी पिताजी के पास गये।
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